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महाभारत युद्ध में अभिमन्यु वीर गति को प्राप्त क्यों हुआ था ?
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महाभारत युद्ध में अभिमन्यु  वीर गति को प्राप्त क्यों हुआ था ?

महाभारत युद्ध में अभिमन्यु वीर गति को प्राप्त क्यों हुआ था ?

|| वीर अभिमन्यु || 1)अभिमन्यु कौन था ? अभिमन्यु वास्तव में चंद्रदेव का बेटा था और उसे धरती पर मनुष्य बनकर रहने का शाप मिला था। लेकिन चंद्रदेव को अपने बेटे की बहुत याद आती थी। इसलिए उन्होंने कृष्ण से अनुरोध किया कि वे अभिमन्यु को 16 साल की उम्र में मुक्त कर देंगे। इसका एकमात्र कारण भी जानेगे की 16 वर्ष की आयु में अभिमन्यु की मृत्यु कैसे हुई। 2)अभिमन्यु किसका पुत्र था ? जब अभिमन्यु ने वास्तव में पृथ्वी पर जन्म लिया,उस समय वह महाभारत के लोकप्रिय पात्र अर्जुन और कृष्ण की बहन सुभद्रा का पुत्र  था।वैसे तो सभी पांडवों को द्रौपदी के साथ भी संतानें हुईं। लेकिन उनमें से अभिमन्यु की कहानी सबसे लोकप्रिय है। जिसने केवल 16 वर्ष की आयु में युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त किया। 3)अभिमन्यु अपनी माँ के गर्भ से क्या सुन रहा था ? एक बार रात को अर्जुन अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा के साथ बात कर रहा था जब वह उसे चक्रव्यूह के बारे में बताता है। चक्रव्यूह यानी युद्ध में सैनिकों को खड़ा करके एक ऐसी गोलाकार संरचना का निर्माण करना जिसमें कई परतें होती है । इस व्यूह से बाहर निकलना प्रवेश करने की तुलना में कहीं अधिक कठिन होता है। सुभद्रा के गर्भ के अंदर उसका होने वाला पुत्र अभिमन्यु भी अपने पिता से इस व्यूह रचना के बारे में सुन रहा था। अर्जुन सुभद्रा को बता रहा था कि चक्रव्यूह में कैसे प्रवेश किया जाता है लेकिन तभी सुभद्रा को नींद आने लगी और अर्जुन ने बात वहीं रोक दी। गर्भ में पल रहा अभिमन्यु अपने पिता से चक्रव्यूह से बाहर निकलने की रणनीति नहीं सीख पाया। 4)जब कौरव और पांडवो के बीच हुआ युद्ध ? कुछ समय बाद पांडव कौरवों से द्यूत क्रीड़ा में अपना राजपाट हार गए और उन्हें 12 वर्ष के वनवास और 1 वर्ष के अज्ञातवास पर जाना पड़ा। इस समय के दौरान अभिमन्यु का जन्म हुआ और वह अपनी माँ के साथ अपने मामा श्री कृष्ण के घर द्वारका में पलने लगा। समय आने पर पांडव वनवास व अज्ञातवास से लौटे लेकिन दुर्योधन ने जब उन्हें उनका राज्य वापस करने से मना कर दिया व कई प्रयासों व चर्चाओं के बाद भी वह नहीं माना तो पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध होना तय हो गया। 5)युद्ध के दौरान द्रोणाचार्य ने किसको पकड़ने की रणनीति बनाई जिस कारण युद्ध जल्दी समाप्त हो जाए ? निश्चित समय पर पांडवों और कौरवों के बीच कुरुक्षेत्र में युद्ध छिड़ गया। 12 दिनों तक भयंकर घमासान मचा रहा और कौरवों के सेनापति भीष्म को अर्जुन ने शरशैय्या पर लिटा दिया। 13वें दिन, कौरवों के सेनापति बने गुरु द्रोणाचार्य जो चक्रव्यूह की रचना जानते थे। द्रोणाचार्य ने पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर को पकड़ने की रणनीति बनाई। इसके पीछे उनका उद्देश्य था कि ऐसा होने पर युद्ध जल्द ही समाप्त हो जाएगा और कौरवों की जीत होगी। इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने अपनी सेना को चक्रव्यूह संरचना में खड़ा करने और युधिष्ठिर को फंसाने का निर्णय लिया। 6)जिस समय की गई चक्रव्यूह की रचना ? चक्रव्यूह भेदने की विद्या द्रोणाचार्य के अलावा केवल भीष्म, कृष्ण और अर्जुन को ही ज्ञात थी। इसलिए रणनीति के अनुसार कौरवों का एक योद्धा अर्जुन को युद्ध क्षेत्र से बहुत दूर ले गया और उसे वहां उलझा दिया ताकि वह चक्रव्यूह भेदने के लिए न आ सके। कृष्ण अर्जुन के सारथी थे इसलिए वह भी उसके साथ थे। अब युद्ध भूमि के मध्य में चक्रव्यूह की रचना की गई।व्यूह रचना का समाचार सुनकर पांडव खेमे में हताशा की लहर दौड़ गई। अर्जुन का कहीं पता नहीं था।युधिष्ठिर और भीम को चिंता ने घेर लिया तभी अभिमन्यु को अपनी माँ के गर्भ में सुना हुआ चक्रव्यूह तोड़ने का विवरण याद आ गया। उस वीर योद्धा ने अपने पिता के बड़े भाइयों से कहा मुझे व्यूह में प्रवेश करने की कला ज्ञात है लेकिन बाहर निकलने की नहीं इसलिए आप सभी मेरे पीछे चलिए और व्यूह के केंद्र में जाकर हम एक साथ युद्ध करके कौरवों को हरा देंगे अभिमन्यु की बात सुनकर पांडवों को धीरज तो मिला लेकिन अभिमन्यु की आयु मात्र 16 वर्ष बहुत कम थी इसलिए युधिष्ठिर उसकी बात मानने से हिचकिचा रहे थे। हालांकि कोई अन्य उपाय न होने के कारण वह अभिमन्यु को व्यूह में भेजने के लिए तैयार हो गए। 7)किस प्रकार हुई अभिमन्यु की मृत्यु ? अभिमन्यु कुशल योद्धा था। उसने प्रवेश द्वार को बहुत आसानी से भेद दिया और व्यूह में प्रवेश कर लिया। पांडव अपने रथ पर उसके पीछे ही थे। लेकिन आगे जाकर वे व्यूह रचना में फंस गए और अकेला अभिमन्यु उसकी परतों को भेदते हुए केंद्र में पहुँच गया। अब अभिमन्यु अकेला था और उसके सामने थे कौरवों के 7 महारथी उस समय महाभारत युद्ध की शुरुआत में भीष्म ने युद्ध के नियम बनाए थे जिनमें से एक यह भी था कि एक योद्धा से एक ही योद्धा लड़ेगा। लेकिन कौरवों ने नियम की धज्जियां उड़ा दीं और छल करते हुए अभिमन्यु को चारों तरफ से घेर लिया।वीर अभिमन्यु की ताकत और युद्ध शैली देखकर कौरव भी अचंभित थे। वह अपने प्रत्येक विरोधी के साथ अभूतपूर्व पराक्रम के साथ लड़ रहा था। निःसंदेह यह एक हारी हुई लड़ाई थी, लेकिन अपना रथ, तलवार, धनुष-बाण और भाला खोने के बाद भी अभिमन्यु ने हार नहीं मानी। अंत में उसने अपने टूटे हुए रथ के एक पहिए को शस्त्र के रूप में उठाया और लड़ने लगा। लेकिन सशस्त्र और एक साथ खड़े कौरवों के उन 7 महारथियों ने उसका वध कर दिया।जिस कारण वह वीरगति को प्राप्त हुआ।

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