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महाकुम्भ का पर्व क्या होता है ?
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महाकुम्भ का पर्व क्या होता है ?

महाकुम्भ का पर्व क्या होता है ?

||महाकुम्भ || इतिहास  कुम्भ पर्व का आयोजन अनादिकाल से होता चला आ रहा है, जो केवल भारतवर्ष का ही नहीं अपितु पूरे विश्व के जनमानस की एकता, मानवता एवं आस्था का संगम है।कुंभ पर्व, हिन्दू धर्म का एक अहम त्योहार है यह पवित्र तीर्थयात्रा है, जिसमें लाखों लोग पवित्र नदियों में स्नान करते है कुंभ पर्व, दुनिया का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण आयोजन है, इसका एक अपना सामाजिक आधार होने के साथ-साथ यह विशेष आध्यात्मिक शक्ति भी है।बारह का अंक और कुंभ महापर्व का एक-दूसरे से घनिष्ठ संबंध है। कुंभ पर्व का आयोजन हर 12 साल के बाद किया जाता है, यह पर्व दुनिया का सबसे विशाल, पवित्र, धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व है, जोकि 45 दिनों तक चलता है। कुंभ पर्व में विभिन्न राज्यों और संस्कृतियों के लोग इकट्ठा होते है, जिससे यह स्थान भारतीय विविधता का प्रतीक बन जाता है। 1)कुम्भ का अर्थ व महत्व ? कुम्भ का अर्थ है कलश भारतीय संस्कृति में जन्म से मृत्यु तक के सभी शुभाशुभ संस्कारों में कुम्भ (कलश) को स्थापित करने के पश्चात् ही देव पूजन कर्म करने का विधान है। कलश या घट कुम्भ का पर्याय है, ज्योतिष शास्त्र में बारह राशियों में से कुम्भ एक राशि भी है। कुम्भ का आध्यात्मिक अर्थ है ज्ञान का संचय करना, ज्ञान की प्राप्ति प्रकाश से होती है और कुम्भ स्नान, दर्शन, पूजन से आत्म तत्व का बोध होता है। हमारे अन्दर ब्रह्माण्ड की समस्त रचना व्यापत है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ‘यत् पिण्डे, तत् ब्रह्माण्डे, तत् ब्रह्माण्डे, यत् पिण्डे’, अर्थात् जो मानव पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड है और जो ब्रह्माण्ड में है, वही मानव पिण्ड में है। कुम्भ, ‘घट’ का सूचक है और घट शरीर का, जिसमें घट-घट व्यापी आत्मा का अमृत रस व्याप्त रहता है। 2)बारह का अंक और कुंभ महापर्व का एक-दूसरे से घनिष्ठ संबंध क्या है ?  बारह का अंक और कुंभ महापर्व का एक-दूसरे से घनिष्ठ संबंध है। प्रत्येक शुभ कार्य के लिए बृहस्पति की अनुकूलता परम आवश्यक मानी गई है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड बारह राशियों में विभाजित है, जन्मकुंडली में भी द्वादश भाव अर्थात बारह भाव अथवा बारह घर व्यक्ति के भाग्य और उसके साथ शुभाशुभ घटित होने का आकलन करते है। सूर्य बारह राशियों का भ्रमण बारह मास में तथा बृहस्पति एक राशि को लगभग बारह मास में पूर्ण करता है।इसलिए 12 राशियों का चक्र पूरा करने में बृहस्पति को 12 वर्ष का समय लगता है और 12 वर्ष बाद ही कुम्भ का आयोजन किया जाता है। 3) कुंभ पर्व 12 साल बाद ही क्यों आयोजित किया जाता है ? कुंभ पर्व का समय गुरु बृहस्पति की क्रांति पर आधारित है, बृहस्पति को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में 12 साल लगते है,कुंभ पर्व का आयोजन हर 12 वर्ष में उस स्थान पर किया जाता है जहाँ किसी विशेष प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है या पृथ्वी पर उस स्थान को प्रभावित करती है।खगोल गणनाओं के अनुसार यह पर्व मकर संक्रान्ति के दिन प्रारम्भ होता है, जब सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशि में और वृहस्पति, मेष राशि में प्रवेश करते है,मकर संक्रान्ति के होने वाले इस योग को "कुम्भ स्नान-योग" कहते है और इस दिन को विशेष मंगलकारी माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार खुलते है और इस प्रकार इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है। 4) कुंभ के दौरान नदियों में स्नान का महत्व ? कुंभ पर्व के दौरान नदियों का पानी मटमैला हो जाता है और क्रिस्टलीय (क्रिस्टोग्राफिक)नामक एक परत बन जाती है, जिससे पानी सोने की रोशनी जैसा दिखाई देता है।लोग पापों से मुक्ति पाने और आध्यात्मिक शक्ति हासिल करने की कामना से स्नान करते है ,कुम्भ पर्व के दौरान शरीर को ऊर्जावान बनाने के लिए ऊर्जा मिलती है। हमारा शरीर 70% से अधिक पानी निर्यात करता है, इसलिए पानी की इस (क्रिस्टलोग्राफिक) संरचना से शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है व शारीरिक ऊर्जा बढ़ती है। कुंभ पर्व का मुख्य आकर्षण गंगा, यमुना, क्षिप्रा और गोदावरी नदियों में पवित्र स्नान करना है। मान्यता है कि मकर संक्रांति, माघ पूर्णिमा, और अमावस्या जैसे विशेष तिथियों पर स्नान करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यहाँ स्नान करना साक्षात् स्वर्ग दर्शन माना जाता है। इसका हिन्दू धर्म मे बहुत अधिक महत्व है। 5)कुम्भ क्या क्या महत्व है ? 1)धार्मिक महत्व: इस पर्व का आयोजन विशेष ज्योतिष संयोगों के आधार पर होता है, जब ग्रहों की स्थिति विशेष धार्मिक ऊर्जा का निर्माण करती है। 2)अखाड़े और संतों का समागम: कुंभ पर्व में देशभर के विभिन्न अखाड़ों से साधु-संत आते है, जैसे नागा साधु, अवधूत, और संत-महात्मा। उनकी शोभायात्रा और दर्शन का विशेष महत्व होता है। 3)प्रवचन और सत्संग: पर्व के दौरान अनेक साधु-संत और महात्मा प्रवचन, धार्मिक सभाएं और सत्संग का आयोजन करते है, जिसमें धर्म, जीवन के उद्देश्य, और मोक्ष प्राप्ति पर विचार किए जाते है। 4)वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण: कुंभ पर्व भारतीय संस्कृति का अद्भुत संगम है, जहां आध्यात्मिकता, धार्मिकता, योग और आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार होता है। पर्व में आने वाले श्रद्धालु भारतीय ज्ञान, योग, और ध्यान का अनुभव करते है। 5)भक्तों की विशाल संख्या: यह विश्व का सबसे बड़ा समागम माना जाता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु और पर्यटक आते है।

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